न इश्क़ किया, न काम किया…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिस काम का बोझा सर पे हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिस इश्क़ का चर्चा घर पे हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जो मटर सरीखा हल्का हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना दूर तहलका हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसमें ना जान रगड़ती हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना बात बिगड़ती हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसमें साला दिल रो जाए
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो आसानी से हो जाए…

वो काम भला क्या काम हुआ
जो मज़ा नहीं दे व्हिस्की का
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना मौक़ा सिसकी का…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसकी ना शक्ल इबादत हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसकी दरकार इजाज़त हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जो कहे ‘घूम और ठग ले बे’
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो कहे ‘चूम और भग ले बे’…

वो काम भला क्या काम हुआ
कि मज़दूरी का धोखा हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो मजबूरी का मौक़ा हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसमें ना ठसक सिकंदर की
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना ठरक हो अंदर की…

वो काम भला क्या काम हुआ
जो कड़वी घूंट सरीखा हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें सब कुछ ही मीठा हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जो लब की मुस्कां खोता हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो सबकी सुन के होता हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जो ‘वातानुकूलित’ हो बस
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो ‘हांफ के कर दे चित’ बस…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसमें ना ढेर पसीना हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो ना भीगा ना झीना हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसमें ना लहू महकता हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो इक चुम्बन में थकता हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसमें अमरीका बाप बने
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो वियतनाम का शाप बने…

वो काम भला क्या काम हुआ
जो बिन लादेन को भा जाए
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो चबा…’मुशर्रफ’ खा जाए…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसमें संसद की रंगरलियां
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो रंगे गोधरा की गलियां…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसका सामा खुद बुश होले
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो एटम बम से खुश होले

वो काम भला क्या काम हुआ
जो दुबई फ़ोन पे हो जाये
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो मुंबई आके खो जाये

वो काम भला क्या काम हुआ
जो gym के बिना अधूरा हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो हीरो बनके पूरा हो

वो काम भला क्या काम हुआ
के सुस्त ज़िन्दगी हरी लगे
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
के लेडी मैकबेथ पारी लगे

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसमे चीखों की आशा हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो मज़हब , रंग और भाषा हो

वो काम भला क्या काम हुआ
जो न अंदर की ख्वाहिश हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो पब्लिक की फरमाइश हो

वो काम भला क्या काम हुआ
जो कंप्यूटर पे खटखट हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमे न चिठ्ठी, न खत हो

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसमे सरकार हुज़ूरी हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमे ललकार जरूरी हो

वो काम भला क्या काम हुआ
जो नहीं अकेले दम पे हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो ख़त्म एक चुम्बन पे हो

वो काम भला क्या काम हुआ
के हाय जकड गयी ऊँगली बस
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
के हाय पकड़ गई ऊँगली बस

वो काम भला क्या काम हुआ
के मनो उबासी मल्दी हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमे जल्दी ही जल्दी हो

वो काम भला क्या काम हुआ
जो न साला आनंद से हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो नहीं विवेकानंद से हो

वो काम भला क्या काम हुआ
जो चंद्रशेख आज़ाद न हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो भगत सिंह की याद न हो

वो काम भला क्या काम हुआ
जो पाक जुबां फरमान न हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो गांधी का अरमान न हो

वो काम भला क्या काम हुआ
के खाद में नफरत बो दूँ मैं
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
के हसरत बोले रो दूँ मैं

वो काम भला क्या काम हुआ
के खट तसल्ली हो जाये
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
के दिल न टल्ली हो जाये

वो काम भला क्या काम हुआ,
किस्मत यार पटक मारे
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
के दिल न मारे चटखारे

वो काम भला क्या काम हुआ
के कहीं कोई भी तर्क नही
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
के कढ़ी-खीर में फर्क नही

वो काम भला क्या काम हुआ
चंगेज़ खान को छोड़ दे हम
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
इक और बाबरी तोड़ दे हम

वो काम भला क्या काम हुआ
के एक्टिंग थोड़ी झूल के हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो मर्लीन ब्रेंडो भूल के हो

वो काम भला क्या काम हुआ
performance अपने बाप का घर
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
के मॉडल बोले ‘मैं एक्टर’

वो काम भला क्या काम हुआ
के टट्टी में भी FAX मिले
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
के भट्टी में भी सेक्स मिले

वो काम भला क्या काम हुआ
हर एक bob(robert)-de-niro हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
के निपट चूतिया हीरो हो


पियूष मिश्रा
on
“वो लोग बहुत ख़ुशक़िस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिक़ी करते थे

हम जीते जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया

काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आख़िर तंग आकर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया
– फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (1911-1984), पाकिस्तान”

during a Concert at FTII, Deccan Gymkhana, Pune, Maharashtra.
Jun 30, 2015

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