कृष्ण की चेतावनी…

दो न्याय अगर तो आधा दो,
और उसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
रक्खो अपनी धरती तमाम।

हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!
दुर्योधन वह भी दे न सका,
आशिष समाज की ले न सका,
उलटे, हरि को बाँधने चला,
जो था असाध्य, साधने चला।

हरि ने भीषण हुंकार किया,
अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
भगवान् कुपित होकर बोले-
‘जंजीर बढ़ाकर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।
यह देख, गगन मुझमें लय है,
यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल।
सब जन्म मुझी से पाते हैं,
फिर लौट मुझी में आते हैं।

यह देख जगत का आदि-अन्त,
यह देख, महाभारत का रण,
मृतकों से पटी हुई भू है,
पहचान, कहाँ इसमें तू है?


रामधारी सिंह “दिनकर”
कृष्ण की चेतावनी, पाठ: ३- रश्मिरथी (1952)
लोक भारती प्रकाशन, अल्हाबाद

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One thought on “कृष्ण की चेतावनी…

  1. ‘जब नाश मनुज पर छाता है
    पहले विवेक मर जाता है ‘
    यह पंक्तियाँ रह गई थी 😊😊

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