सfar का

अब न मुझको याद बीता
मैं तो लम्हों में जीता
चला जा रहा हूँ
मैं कहाँ पे जा रहा हूं?
कहां हूं?

इस यकीं से मैं यहां हूं
की ज़माना ये भला है,
और जो राह में मिला है
थोड़ी दूर जो चला है,
वो भी आदमी भला था,
पता था…
ज़रा बस खफ़ा था

वो भटका सा राही, मेरे गांव का ही
वो रस्ता पुराना, जिसे याद आना
ज़रूरी था लेकिन, जो रोया मेरे बिन
वो एक मेरा घर था
पुराना सा डर था
मगर अब न मैं अपने घर का रहा,
सफर का ही था मैं, सफर का रहा

इधर का ही हूं, न उधर का रहा
सफर का ही था मैं, सफर का रहा

मैं रहा.
मैं रहा..
मैं रहा…

मील-पत्थरों से मेरी दोस्ती है
चाल मेरी क्या है राह जानती है
जाने रोज़ाना…
ज़माना वोही रोज़ाना

शहर-शहर फुर्सतों को बेचता हूं
खाली हाथ जाता, खाली लौट’ता हूं
ऐसे रोज़ाना
रोज़ाना खुद से बेगाना

जबसे गांव से मैं शहर हुआ
इतना कड़वा हो गया कि, ज़हर हुआ
मैं तो रोज़ाना
न चाहता था यह हो जाना…मैंने

ये उम्र, वक़्त, रास्ता गुज़रता रहा
सफर का ही था मैं, सफर का रहा

इधर का ही हूं, न उधर का रहा
सफर का ही था मैं, सफर का रहा


इरशाद कामिल
Jul 10, 2017

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